भर्तृहरि का जीवन परिचय | Biography of Bhartrihari In Hindi


भर्तृहरि का जीवन परिचय

प्रस्तावना

भर्तृहरि संस्कृत साहित्य के एक महान कवि, दार्शनिक और योगी थे। उन्होंने नीति, वैराग्य और प्रेम पर अनेक ग्रंथों की रचना की, जो आज भी प्रासंगिक हैं। उनके जीवन और रचनाओं में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। भर्तृहरि की रचनाएँ न केवल भारतीय दर्शन की गहराई को दर्शाती हैं, बल्कि मानव जीवन के उत्थान-पतन का सजीव चित्रण भी करती हैं।

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

भर्तृहरि के जन्म और जीवन के बारे में ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन विद्वानों का मानना है कि वे लगभग 5वीं से 7वीं शताब्दी के बीच हुए थे। कुछ मान्यताओं के अनुसार, वे महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे, जबकि अन्य स्रोत उन्हें राजा गोपीचंद का भाई मानते हैं।

किंवदंतियों के अनुसार, भर्तृहरि उज्जैन के राजा थे, लेकिन उनकी पत्नी पिंगला के प्रेम में डूबे रहने के कारण उन्होंने राजपाट छोड़कर संन्यास ले लिया। इस घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया और वे एक तपस्वी एवं विचारक बन गए।

भर्तृहरि की प्रमुख रचनाएँ

भर्तृहरि ने तीन प्रमुख ग्रंथों की रचना की, जिन्हें "शतकत्रयी" कहा जाता है। ये तीनों ग्रंथ मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं:

1. नीतिशतक
नीतिशतक में भर्तृहरि ने व्यावहारिक जीवन की नीतियों, सदाचार और राजनीति के सिद्धांतों का वर्णन किया है। इसमें 100 श्लोक हैं, जो मनुष्य को सफल और सुखी जीवन जीने की शिक्षा देते हैं।

उदाहरण:
"अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रं, अमित्रस्य कुतो सुखम्॥"
(आलसी को विद्या कहाँ, अविद्वान को धन कहाँ,
निर्धन को मित्र कहाँ, मित्रहीन को सुख कहाँ॥)

2. शृंगारशतक
शृंगारशतक में कवि ने प्रेम, सौंदर्य और नारी के विविध रूपों का वर्णन किया है। यह ग्रंथ श्रृंगार रस से परिपूर्ण है और मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण प्रस्तुत करता है।

उदाहरण:
"चन्दनं शीतलं लोके, चन्दनादपि चन्द्रमा।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये, शीतला साधुसंगतिः॥"
(संसार में चंदन शीतल है, चंदन से भी चंद्रमा शीतल है,
किंतु चंदन और चंद्रमा से भी अधिक शीतल सज्जनों की संगति है॥)

3. वैराग्यशतक
वैराग्यशतक में भर्तृहरि ने संसार की नश्वरता, मोह-माया से मुक्ति और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया है। यह ग्रंथ संन्यासियों और जिज्ञासुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

उदाहरण:
"यावज्जीवं सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य, पुनरागमनं कुतः॥"
(जब तक जीवन है, सुख से जियो, ऋण लेकर भी घी पीओ,
क्योंकि जब शरीर भस्म हो जाएगा, तो फिर लौटकर आना कहाँ संभव है॥)
भर्तृहरि का दर्शन

भर्तृहरि का दर्शन जीवन के तीन मुख्य आयामों—अर्थ (धन), काम (इच्छाएँ) और मोक्ष (मुक्ति) पर आधारित है। उनके श्लोकों में गहन दार्शनिक चिंतन झलकता है। वे मानते थे कि मनुष्य को भोग और त्याग के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए।

उनकी शिक्षाएँ बताती हैं कि:

सांसारिक सुख अनित्य हैं।
विद्या और नीति से ही मनुष्य महान बनता है।
वैराग्य ही सच्चे सुख का मार्ग है।
भर्तृहरि की लोकप्रियता

भर्तृहरि के श्लोक आज भी लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। उनकी रचनाएँ न केवल संस्कृत साहित्य में, बल्कि हिंदी, तमिल, तेलुगु और अन्य भाषाओं में भी प्रसिद्ध हैं। उनके विचारों ने कबीर, तुलसीदास और रहीम जैसे कवियों को भी प्रभावित किया।

निष्कर्ष

भर्तृहरि एक महान कवि, योगी और दार्शनिक थे, जिन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को श्लोकों के माध्यम से अमर बना दिया। उनकी रचनाएँ मनुष्य को सही मार्ग दिखाने वाली प्रकाश-स्तंभ के समान हैं। आज के भौतिकवादी युग में भर्तृहरि के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं, क्योंकि वे मनुष्य को सच्चे सुख और शांति की ओर ले जाते हैं।

इस प्रकार, भर्तृहरि का जीवन और साहित्य हमें यह शिक्षा देता है कि "जीवन में संयम, ज्ञान और वैराग्य ही सच्ची सफलता की कुंजी हैं।"